कुदरत का कहर

ये कैसा कहर लाया क़ुदरत ने
की इंसानियत ही दाव पे लगाई।
अमीरों की वेकेशन चालू हुई
तो गरीबों की जिंदगी से लड़ाई।।

कभी शहर में घर लेनेका एक सपना था
आज उधर रहने को भी तैयार नहीं हैं।।
जिस गांव से भाग आये थे
आज उसी गाव वापस जाना चाहते हैं।।

हमेशा सोशल रहने वाले
आज मिलने से भी डर रहे हैं।।
रूह ही बातें सुनाकर जिस्म से खेलने वाले
आज जिस्म से ही दूर जा रहें हैं।।

जिन्होंने जिंदगी पिंजरे में बिताई
वो आज खुले घूम रहे हैं।।
और खुद को सर्वश्रेष्ठ समझने वाले
आज खुद ही पिंजरे में कैद हैं।।

ये कैसा कहर लाया क़ुदरत ने
की इंसानियत ही दाव पे लगाई।।

© PRATILIKHIT

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जगण्यात मौज आहे…

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1 Comment

  1. *_घर गुलज़ार, सूने शहर, बस्ती बस्ती में कैद हर हस्ती हो गई।_*
    *_आज फिर ज़िन्दगी महँगी और दौलत सस्ती हो गई ।_*

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